Prithviraj chauhan biography

पृथ्वीराज चौहान जीवनगाथा | Prithviraj chauhan biography

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पृथ्वीराज चौहान  जीवनगाथा

पृथ्वीराज चौहान

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पृथ्वीराज चौहान का जन्म(Birth) कब और  कैसे हुआ?

धरती के महान शासक पृथ्वीराज चौहान का जन्म 7 जून, 1149 में  हुआ था.  महाराजा  सोमेश्वर और कपूरी देवी की संतान थे, उनका जन्म उनके माता-पिता के विवाह के बाद 12 वर्ष के पश्चात हुआ था  और यह बात राज्य में खलबली का कारण बन गई मात्रा 11 वर्ष की आयु में उनके सर से पिता का साया उठ  गया था. सन 1161 के युद्ध में उनके पिता की मृत्यु के बाद चौहान को उत्तराधिकारी घोषित किया गया .

माता का नाम :  कर्पूरी देवी

पिता का नाम : महाराजा सोमेश्वर चौहान

भाई का नाम: हरिराज

जन्म स्थल:  गुजरात

जन्म: 7 जून, 1149

मृत्यु:  1192

पत्नी का नाम:  संयोगिता

जीवन काल: 43 वर्ष

पराजय:  मोहम्मद गोरी से

 

इतिहास पृथ्वीराज चौहान इतिहास (Prithviraj Chauhan history)

पृथ्वीराज चौहान

लोक किंवदंतियों में पृथ्वीराज चौहान या राय पिथोरा के नाम से जाना जाने वाला पृथ्वीराज, चहमान (चौहान) वंश का एक भारतीय राजा था। पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास मे एक बहुत ही अविस्मरणीय नाम है. चौहान वंश मे जन्मे पृथ्वीराज आखिरी हिन्दू शासक भी थे. महज 11 वर्ष की उम्र मे, उन्होने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला |



 

शिक्षा पृथ्वीराज चौहान शिक्षा (Prithviraj Chauhan education)

बचपन से ही ना केवल तीर कमान बल्कि भाला तलवार और सुंदर भेदी बाण विद्या में निपुण थे| श्री राम गुरुजी ने बचपन से ही युद्ध कौशल और रणनीति देखकर यह भविष्वाणी भी कर दी थी कि पृथ्वीराज चौहान का नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा | पृथ्वीराज चौहान जब ग्रुप में थे तब भीमदेव ने अजमेर पर हमला कर दिया था लेकिन उसे सोमेश्वर जी के हाथों मुंह की खानी पड़ी महाराज सुमेश्वर इस बार भी विजय रहे |
पृथ्वीराज की मध्ययुगीन जीवनी ने सुझाव दिया कि वह अच्छी तरह से शिक्षित हुए थे। पृथ्वीराज विजया ने कहा कि उन्होंने 6 भाषाओं में महारत हासिल की थी | पृथ्वीराज रासो का दावा है कि उन्होंने 14 भाषाओं को सीखा है, जो अतिशयोक्ति प्रतीत होता है। रासो का दावा है कि वह इतिहास, गणित, चिकित्सा, सैन्य, चित्रकला, दर्शन (मिमांसा) और धर्मशास्त्र सहित कई विषयों में अच्छी तरह से निपुण थे। दोनों ग्रंथों का कहना है कि वह विशेष रूप से तीरंदाजी में कुशल थे।

 

राजतिलक पृथ्वीराज चौहान

पृथ्वीराज चौहान गुजरात से अजमेर गए, जब उनके पिता सोमेश्वर ने पृथ्वीराज द्वितीय की मृत्यु के बाद  राजा का ताज पहनाया। सोमेश्वर के 1177 सीई  में मृत्यु हो गई, जब पृथ्वीराज लगभग 11 वर्ष का था। सोमेश्वर के शासनकाल के अंतिम शिलालेख और पृथ्वीराज के शासनकाल के पहले शिलालेख दोनों इस वर्ष के दिनांकित हैं। पृथ्वीराज, जो उस समय एक नाबालिग थे, राजगारी के रूप में अपनी मां के साथ सिंहासन पर चढ़े थे।  हम्मा महाकाव्य का दावा है कि सोमेश्वर ने स्वयं सिंहासन पर पृथ्वीराज को स्थापित किया था, और फिर जंगल में सेवानिवृत्त हो गया। हालांकि, यह संदिग्ध है|

 

रानी संयोगिता का स्वयंवर (Sanyogita or Prithviraj marrige)

चौहान और उनकी रानी संयोगिता का प्रेम आज भी राजस्थान के इतिहास मे अविस्मरणीय है . दोनों ही एक दूसरे से बिना मिले केवल चित्र देखकर एक दूसरे के प्यार मे मोहित हो चुके थे. वही संयोगिता के पिता जयचंद्र पृथ्वीराज के साथ ईर्ष्या भाव रखते थे, तो अपनी पुत्री का पृथ्वीराज चौहान से विवाह का विषय तो दूर दूर तक सोचने योग्य बात नहीं थी. जयचंद्र केवल पृथ्वीराज को नीचा दिखाने का मौका ढूंढते रहते थे, यह मौका उन्हे अपनी पुत्री के स्व्यंवर मे मिला. राजा जयचंद्र ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्व्यंवर आयोजित किया| इसके लिए उन्होने पूरे देश से राजाओ को आमत्रित किया, केवल पृथ्वीराज चौहान को छोड़कर. पृथ्वीराज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से उन्होने स्व्यंवर मे पृथ्वीराज की मूर्ति द्वारपाल के स्थान पर रखी. परंतु इसी स्व्यंवर मे पृथ्वीराज ने संयोगिता की इच्छा से उनका अपहरण भरी महफिल मे किया और उन्हे भगाकर अपनी रियासत ले आए. और दिल्ली आकार दोनों का पूरी विधि से विवाह संपन्न हुआ. इसके बाद राजा जयचंद और पृथ्वीराज के बीच दुश्मनी और भी बढ़ गयी|

 

घूरिड के साथ युद्ध  (War with the Ghurids)

तरन की पहली लड़ाई

अपने साम्राज्य के विस्तार और सुव्यवस्था पर पृथ्वीराज की पैनी दृष्टि हमेशा जमी रहती थी। अब उनकी इच्छा पंजाब तक विस्तार करने की थी। किन्तु उस समय पंजाब पर मुहम्मद शाहबुद्दीन गौरी का राज था। ११९० ई० तक सम्पूर्ण पंजाब पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो चुका था।
पृथ्वीराज एक विशाल सेना लेकर पंजाब की ओर रवाना हो गया। तीव्र कार्यवाही करते हुए उसने हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलो पर अपना अधिकार कर लिया। इसी बीच उसे सुचना मिली की अनहीलवाडा में विद्रोहियों ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। पंजाब से वह अनहीलवाडा की ओर चल पड़ा। उनके पीठ पीछे गौरी ने आक्रमण करके सरहिंद के किले को पुन: अपने कब्जे में ले लिया।
रावी नदी के तट पर पृथ्वीराज के सेनापति समर सिंह और गौरी की सेना में भयंकर युद्ध हुआ परन्तु कुछ परिणाम नहीं निकला। यह देख कर पृथ्वीराज गौरी को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ा | तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतो ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर-मुली की तरह काट डाला गया। सुल्तान मुहम्मद गौरी युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ।




अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से वह घायल अवस्था में गिरने ही वाला था की युद्ध कर रहे एक उसके सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सुल्तान के घोड़े की कमान संभल ली और कूद कर गौरी के घोड़े पर चढ़ गया और घायल गौरी को युद्ध के मैदान से निकाल कर ले गया। नेतृत्व विहीन सुल्तान की सेना में खलबली मच चुकी थी। तुर्क सेनिक राजपूत सेना के सामने भाग खड़े हुए। पृथ्वीराज की सेना ने ८० मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया। पर तुर्क सेना ने वापस आने की हिम्मत नहीं की। इस विजय से पृथ्वीराज चौहान को ७ करोड़ रुपये की धन सम्पदा प्राप्त हुयी। इस धन सम्पदा को उसने अपने बहादुर सैनिको में बाँट दिया। इस विजय से सम्पूर्ण भारतवर्ष में पृथ्वीराज की धाक जम गयी और उनकी वीरता, धीरता और साहस की कहानी सुनाई जाने लगी।

तरन की दूसरी लड़ाई

पृथ्वीराज चौहान द्वारा राजकुमारी संयोगिता का हरण करके इस प्रकार कनौज से ले जाना रजा जयचंद को बुरी तरह कचोट रहा था। उसके ह्रदय में अपमान के तीखे तीर से चुभ रहे थे। वह किसी भी कीमत पर पृथ्वीराज का विध्वंश चाहता था। भले ही उसे कुछ भी करना पड़े। विश्वसनीय सूत्रों से उसे पता चला की मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है। बस फिर क्या था जयचंद को मानो अपने मन की मुराद मिल गयी। उसने गौरी की सहायता करके पृथ्वीराज को समाप्त करने का मब बनाया। जयचंद अकेले पृथ्वीराज से युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता था।

देशद्रोही जयचंद की सहायता पाकर गौरी तुरंत पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए तैयार हो गया। जब पृथ्वीराज को ये सुचना मिली की गौरी एक बार फिर युद्ध की तैयारियों में जुटा हुआ तो उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मुहम्मद गौरी की सेना से मुकाबल करने के लिए पृथ्वीराज के मित्र और राज कवि चंदबरदाई ने अनेक राजपूत राजाओ से सैन्य सहायता का अनुरोध किया परन्तु संयोगिता के हरण के कारण बहोत से राजपूत राजा पृथ्वीराज के विरोधी बन चुके थे वे कन्नौज नरेश के संकेत पर गौरी के पक्ष में युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

देशद्रोही जयचंद का इससे भी बुरा हाल हुआ, उसको मार कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया गया। पृथ्वीराज की हार से गौरी का दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब और सम्पूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार हो गया। भारत मे इस्लामी राज्य स्थापित हो गया। अपने योग्य सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का गवर्नर बना कर गौरी, पृथ्वीराज और चंदबरदाई को युद्धबन्धी के रूप में अपने गृह राज्य गौरी की और रवाना हो गया।

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हिंदू शासकों के साथ युद्ध

जेजाकबच्चि के चंदेल के साथ युद्ध

इ.स.1239 मैं ही महोबा के  चंदेलवंशी  राजा  परमार्दीदेव पर आक्रमण कर उस युद्ध में विजय प्राप्त कर उसके राज्य को अपने अधीन किया

भदनकस





इ.स.1239 मैं
अलवर रेवाड़ी भीवानी आदि क्षेत्रों में  मडानको  ने विद्रोह किया इस विद्रोह को दबाकर  विजय प्राप्त की

नागार्जुन के साथ संघर्ष

राज्य सिहासन  पर बैठते हैं मात्र 14 वर्ष की आयु में पृथ्वीराज  से गुड़गांव पर नागार्जुन ने अधिकार के लिए विद्रोह किया था इसमें   वी.स.1237  मैं विजय प्राप्ति की

कन्नौज के गहादवाल

अन्य सासको के साथ संघर्ष

कर्नाटक के राजा  वीरसेन यादव को जितने के लिए पृथ्वीराज ने उस पर हमला करके उसे अपने अधीन कर लिया और दक्षिण के सभी राजा इस युद्ध के बाद उसके  अधिन हो गए सब राजाओ ने मिलकर इस विषय पर पृथ्वीराज को कई चीजें  भेट की

चौहान की मोत कब और कैसे हुई? (Prithviraj Chauhan death)

गौरी से युद्ध के पश्चात पृथ्वीराज को बंदी बनाकर उनके राज्य ले जाया गया वहां उनकी यातनाएं दी गई तथा पृथ्वीराज  की आंखों को
लोहे के सरीयो द्वारा जलाया गया इसमें वह अपने आंखों की रोशनी खो बैठे जब पृथ्वीराज सिंह के मृत्यु से पहले आखरी इछछा पूछी गई,तो उन्होंने भरी सभा में अपने मित्र चंदबरदाई के शब्दों को शब्दभेदी बाण का उपयोग करने की इच्छा प्रकट की और इसी प्रकार चंदबरदाई द्वारा बोले गए दोहे का प्रयोग करते हुए उन्होंने गौरी की हत्या भरी सभा में कर दी  इसे पश्चात अपनी दुर्गति से बचने के लिए दोनों ने एक दूसरे के जीवन लीला भी समाप्त कर दी और जब सयोगिता ने यह खबर सुनी तो उसने भी अपना जीवन समाप्त कर लिया |




13 वीं शताब्दी के फारसी इतिहासकार मिन्हज-ए-सिराज का कहना है कि कैद होने के बाद पृथ्वीराज को “नरक में भेज दिया गया”। 16 वीं सदी के इतिहासकार फ़िरशीट भी इस खाते का समर्थन करते हैं। इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार, मिन्हज के खाते से पता चलता है कि पृथ्वीराज को उनकी हार के तुरंत बाद मार डाला गया था |

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